सूर्यभेदी प्राणायाम का शरीर पर पड़ने वाले प्रभावएवं लाभ का
विवेचनात्मक अध्ययन
प्रांशु कुमार मौर्य1, रामू मौर्य2, मोनिका विष्वकर्मा3
1असिस्टेंट प्रोफेसर (योग विभाग), देव संस्कृति विश्वविद्यालय साकरा कुम्हारी दुर्ग, छत्तीसगढ़.
2योग प्रशिक्षक, योग वेलनेस सेंटर, राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय मिलक रामपुर, उत्तर प्रदेश.
3योग चिकित्सक, सर्वाग योग केन्द्र, होलिस्टिक वेलनेस सेंटर, गोमती नगर लखनऊ, उत्तर प्रदेश.
*Corresponding Author E-mail: Pranshumaurya9@gmail.com
ABSTRACT:
वर्तमान समय में मानव जीवन अस्त व्यस्त होने के कारण विभिन्न प्रकार की शारीरिक मानसिक बीमारियां दिन प्रतिदिन की जिंदगी में बढ़ती जा रही हैं इन बीमारियों का निराकरण हम योग के माध्यम से कर सकते हैं। जिनमें सूर्यभेदी प्राणायाम अत्यंत लाभकारी माना गया है। जो मोटापा से लेकर के थायराइड, अस्थमा, गठिया, मधुमेह, साइनस, रक्त संचार को सुव्यवस्थित करना, नाड़ी संस्थान को मजबूत बनाना, बुढ़ापा एवं मृत्यु को दूर करना, सभी प्रकार के रोगों को सूर्यभेदी प्राणायाम से शीघ्र ही दूर किया जा सकता है। साथ ही साथ कुण्डलिनी शक्ति का जागरण भी सूर्यभेदी प्राणायाम से सरलता पूर्वक हो जाता है। सूर्यभेदी प्राणायाम शरीर को ऊर्जा के साथ साथ शरीर में होने वाली सभी प्रकार की क्रियाओं का संचालन, परिवर्तन तथा शरीर के विजातीय द्रव्यों का निष्कासन एवं शरीर की शुद्धि के साथ-साथ कृमि रोगों से रोगों से शरीर को बचाकर, शरीर को स्वस्थ एवं दीर्घायु प्रदान करने का लाभ भी सूर्यभेदी प्राणायाम के माध्यम से प्राप्त होते हैं।
KEYWORDS: सूर्यभेदी, कुंडलिनी, जरा मृत्यु, क्रीमी नाशक, कपाल शोधन।
प्रस्तावना:-
यौगिक साधना मे प्राणायाम का विशेष महत्व बतलाया गया है। प्रमुख हठयोगियों ने प्राणायाम को नाड़ी शुद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है तथा कुछ ने प्राणशक्ति के विस्तार रूप मे एवं स्वास्थ्य संवर्धन हेतु प्राणायाम को विशेष महत्व दिया है। प्राणायाम मे प्राण तत्व, जिसे जीवनी शक्ति भी कहा जाता है। यह प्राण शरीर के विभिन्न अंगों स्थानों पर प्याप्त रहकर अपना कार्य करता है। यह आत्मा को शरीर मे रहने योग्य, शरीर जीवित बनाये रखता है। यही प्राण पंच तत्वों मे रहकर उनको उपयोगी बनाता है। प्रश्नोपनिषद के अनुसार प्राणों की उत्पत्ति आत्मा से मानी गई है। गायत्री महाविज्ञान के अनुसार सूर्यभेदी प्राणायाम से ओज, तोज, यश, ऐश्वर्य, पुरुषार्थ, ये पाँच लाभ मिलते है।
मुख्य प्राण स्थान एवं उनके कार्य
प्राणोऽपानः समानश्चोदानव्यानौ तथैव च ।
नागः कूर्मश्च कृकलो देवदत्तो धनञ्जयः ॥60॥
हृदि प्राणो वहेन्नित्यमपानो गुदमण्डले ।
समानो नाभिदेशे तु उदानः कण्ठमध्यमः ॥61॥
व्यानो व्याप्य शरीरे तु प्रधानाः पञ्च वायवः ।
प्राणाद्याः पञ्च विख्याता नागाद्याः पञ्चवायवः ॥62॥
तेषामपि च पञ्चानां स्थानान्यपि च वदाम्यहम् ।
उद्गारे नाग आख्यातः कूर्मस्तून्मीलने स्मृतः ॥63॥
कृकलः क्षुत्कृते ज्ञेयो देवदत्तो विजृम्भणे ।
न जहाति मृते क्वापि सर्वव्यापी धनञ्जयः ॥64॥
नागो गृह्णाति चैतन्यं कूर्मश्चैव निमेषणम् ।
क्षुधा त्तृट् कृकरश्चैव चतुर्थेन तु जृम्भणम् ॥65॥
भवेद्धनञ्जयाच्छब्दं क्षणमात्रं न निःसरेत् ॥66॥
सर्वे तु सूर्यसम्भिन्ना नाभिमूलात्समुद्धरेत् ।
इडया रेचयेत्पश्चाद्धैर्येणाखण्डवेगतः ॥67॥
पुनः सुर्येण चाकृष्य कुम्भयित्वा यथाविधि ।
रेचयित्वा साधयेक्तु क्रमेण च पुनः पुनः ॥68॥
यह प्राण (जड़ $ चेतन) के मिश्रण का स्वरूप होने के कारण यह मानव शरीर में 10 रूपों से (5 महाप्राण तथा 5 उपप्राण) के रूप मे उनके कार्य एवं स्थान के आधार पर शरीर के विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त है। । महाप्राण- (1) प्राण, (2) अपान, (3) उदान, (4) समान (5) व्यान, अन्य पाँच वायु हैं- (6) नाग (7) कूर्म (8) कुकल (9) देवदत्त और (10) धनञ्जय। इन्हें उपप्राण कहते हैं। इन्हीं दस (वायुओं) के माध्यम से सब शारीरिक कार्य सम्पन्न किये जाते हैं। प्राण वायु का निवास स्थान “हृदय“ स्थान माना गया है नाग उपप्राण भी उसी के समीप रहता है। अपान मूलाधार के स्थान पर तो उसी के पास लघुप्राण कूर्म का भी निवास है। समान और कृकल नाभि मे रहते है। उदान और देवदत्त का स्थान कण्ठ प्रदेश है। व्यान और धनञ्जय मे आकाश तत्व का अधिक मिश्रण होने से ये सम्पूर्ण शरीर मे व्याप्त रहता है। इसका प्रधान स्थान केंद्र मस्तिष्क को माना गया है।
साधारणता ऐसा माना जाता है कि प्राणों के द्वारा शब्द एवम् मस्तिष्क का पोषण होता है। अपान (प्राण) से मलमूत्र श्वेद सभी विजातीय द्रव्यों आदि का विर्सजन होता है। समान (प्राण) से पाचन, परिपाक और शरीर में ऊर्जा, उष्णता आदि का संचार होता है। उदान (प्राण) से विविध वस्तुओ को बाहर से शरीर के भीतर ग्रहण करता है साथ ही साथ शरीर को मजबूत बनाना शरीर को खड़ा करके रखने का कार्य भी उदान प्राण के द्वारा ही होता है। यह कंठ के साथ-साथ शरीर के जोड़ों एवं हड्डियों में उपस्थित भी रहता है। व्यान प्राण से का रक्त संचार होता है। लघु प्राणों मे नाग से डकार का काम होता है। कूर्म से पलक झपकने तथा बन्द करने का काम करता है। कृकल से छींकना, भूख लगना और देवदत्त से जम्हाई लेना गादि का काम होता है। धनञ्जय जीवित अवस्था मे शरीर का पोषण करता है। और मरने पर देह को सड़ा गलाकर शीघ्र नष्ट करने का कार्य करता है। सूर्यभेदी प्राणायाम में इन्हीं प्राणों को विस्तार किया जाता है। यह विस्तार प्रक्रिया पूरक (श्वास लेना), कुम्भक (स्वास रोकना), रेचक (श्वास छोड़ना) प्राणायाम माध्यम से की जाती है।॥63-68॥
सूर्यभेदी प्राणायाम करने की विधि:
घेरण्ड सहिताः
कथितं सहितं कुम्भं सूर्यभेदनकं श्रृणु ।
पूरयेत् सूर्यनाड्या च यथाशक्ति बहिर्मरुत् ॥58॥ धारयेद्यत्नेन कुम्भकेन जलन्धरैः ।
यावत्स्वेदं नखकेशाभ्यां तावत्कुर्वन्तु कुम्भकम् ॥59॥
सर्वप्रथम दाहिनी नासिका (सूर्य स्वर) से अपनी क्षमता के अनुसार स्वास को धीरे-धीरे पूरी तरह से फेफड़ों में भर ले, फिर जालंधर बंध लगाते हुए कुछ देर कुंभक के माध्यम से भरी हुई वायु (स्वास) को रोके, जब तक पैर से लेकर सिर (बालों) वालों तक पसीना ना आ जाए तब तक वायु को रोककर रखना चाहिए। उसके बाद बाईं नासिका (चंद्र स्वर) से धीरे-धीरे श्वास को छोड़ दें। यही सूर्यभेदन प्राणायाम करने की विधि है। (5/58-59)
हठप्रदीपिका
आसने सुखदे योगी बद्ध्वा चैवासनं ततः
दक्षनाड्या समाकृष्य बहिस्थं पवनं शनैः ।। 48 ।।
आकेशादानखाग्राच्च निरोधावधि कुम्भयेत्
ततः शनैः सव्यनाड्या रेचयेत् पवनं शनैः ॥49॥
साधक को सर्वप्रथम स्वच्छ स्थान पर आसन बिछाकर उस पर सुख पूर्वक बैठ कर दाहिने (सूर्य स्वर) से वायु को धीरे धीरे अंदर खींच कर भर ले। फिर कुंभक लगाकर थोड़ी देर रोके, यथासंभव अपनी क्षमता के अनुसार रोकने के बाद, उसे धीरे-धीरे बाईं नासिका से छोड़ दें। यह सूर्यभेदन अभ्यास कहलाता है।(2/48.49)
हठरत्नवाली
दक्षनाड्या समाकृष्य बहिःस्थं पवनं शनैः ।
यथा लगति कण्ठात्तु हृदयावधि सस्वनम् ॥10॥
यथेष्टं कुम्भयेद्वायुं रेचययेदिडया ततः ।
कपालं शोधनं चापि रेचयेत्पवनं शनैः ॥11॥
सर्वप्रथम साधक को साधक को बाहर की व्याप्त वायु को धीरे धीरे दाएं नासिका से अंदर खींचे, कंठ, हृदय तक पूर्ण रूप से घर्षण करते हुए मधुर ध्वनि के साथ भर ले, अपनी क्षमता के अनुसार भरी हुई वायु को थोड़ी देर रोके, फिर धीरे-धीरे बाईं नासिका से निकाल दे सूर्यभेदन प्राणायाम कहलाता है।
पंडित श्रीराम शर्मा के अनुसार
आचार्य श्री ने सूर्यभेदी प्राणायाम की दो विधियां बतलाई हैं
ऽ दाहिने स्वर से स्वास लेना फिर यथा संभव कुम्भक करना और बाएं स्वर से वायु को छोड़ देना। यही प्रक्रिया को बार बार दोहराना ही सूर्य भेदी प्राणायाम है।
ऽ दोनो स्वरों से श्वास लेना (पुरक करना) या किसी भी एक स्वर से श्वास लेना और श्वास छोड़ना (रेचक) केवल चंन्द्र स्वर (बाये स्वर ) करना ही सूर्य भेदी प्रणायाम है। यह सभी रोगों को रोगों को नष्ट करने वाला प्राणायाम है।
गोरक्ष शतक
प्राण“ सूर्येण चाकृष्य पूरयेदुदरं शनैः ।
कुम्भयित्वा विधानेन भूयश्चन्द्रेण रेचयेत् ॥45॥
सर्वप्रथम किसी सुखासन में बैठकर प्राण वायु को पिंगला नाड़ी अर्थात सूर्य स्वर से धीरे धीरे अंदर (उदर) तक भर ले। वायु के भर जाने के पश्चात साधक अपनी क्षमता के अनुसार भरी हुई वायु को कुंभक लगाकर रोक ले, अंत में इडा नाडी अर्थात चंद्र स्वर से पुनः धीरे-धीरे छोड़ दें। यह प्रक्रिया सूर्यभेदन कहलाती हैं।
प्रज्वलज्वलनज्वालापुञ्जमादित्यमण्डलम् ।
ध्यात्वा नाभिस्थितं योगी प्राणायामे सुखी भवेत् ॥46॥
इस प्रकार विधि पूर्वक सूर्यभेदी प्राणायाम करते समय नाभि प्रदेश में स्थित सूर्य मंडल का ध्यान करना चाहिए। जैसे जलती हुई अग्नि का समूह के समान लाल वर्ण के तेज समान तेज का ध्यान के साथ आनंद का अनुभव करना चाहिए।
रेचकः पूरकश्चैव कुम्भकः प्रणवात्मकः ।
प्राणायामो भवेत् त्रेघा मात्राद्वादशसंयुतः॥47॥
12 मात्राओं वाला यह सूर्यभेदी प्राणायाम प्रणव के साथ तीन भागों रेचक, पूरक और कुम्भक वाला होता है ।
शरीरिक प्रभाव (लाभ)
घेरण्ड सहिताः
कुम्भकः सूर्यभेदस्तु जरामृत्युविनाशकः ।
बोधयेत्कुण्डलीं शकिं्त देहानलविवर्धनम् ।
इतिते इडया कुम्भकःकथितं चण्डं सूर्यभेदनमुत्तमम् ॥69॥
सूर्यभेदी प्राणायाम करने से साधक को बुढ़ापा एवं मृत्यु से मुक्ति मिल जाती है। साथ ही कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है,और शरीर को अधिक मात्रा में ऊर्जा की प्राप्ति होती है। (5/69)
हठप्रदीपिका
कपालशोधनं वातदोषघ्नं कृमिदोषहत् ।
पुनः पुनरिदं कार्यं सूर्यभेदनमुत्तमम् ॥50॥
सूर्यभेदी प्राणायाम मस्तिष्क प्रदेश को शुद्ध करता है। वात संबंधित सभी प्रकार के रोगों को दूर करता है। पेट (उदर) में उत्पन्न होने वाले क्रीमी दोषों को नष्ट करता है। अतः यह सूर्यभेदी प्राणायाम अत्यंत उत्तम प्राणायाम है। इसका अभ्यास हमेशा प्रत्येक साधक को करना चाहिए।(2/50)
हठरत्नवाली
आलस्यं वातदोषघ्नं कृमिकीटं निहन्ति च ।
पुनः पुनरिदं कार्य सूर्यभेदाख्यकुम्भकम् ॥12॥
सूर्यभेदन प्राणायाम से मस्तिष्क प्रदेश की शुद्धि होती है। आलस्य पूरी तरह से दूर हो जाता है, वात सम्बंधी रोग दूर होते हैं, क्रीमी दोष भी नष्ट हो जाते हैं। इसका अभ्यास बार-बार करना चाहिए।
शारीरिक प्रभाव
सूर्यभेदी प्राणायाम (2150) जो शरीर मे उष्णता के साथ साथ नाड़ी शुद्धि मस्तिष्क कोशिका एवं तंत्रिका कोशिका को भी उत्तेजित कर आवेगों को हमारे ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रियो तक पहुचाने में सक्षम होता है। तथा अंतः स्रावी ग्रन्थिया भी हार्मोंस का सुरारू रूप से स्त्राव का काम करती है।
तत्रिका कोशिका की शुद्धिः
सूर्यभेदी प्राणायाम करने पर हमारे शरीर के मेरुदण्ड के कशेरूका के बीच एक गद्द्दीनुमा जगह रहती है। जिसे वर्टब्रा डिस्क कहा जाता है जो दो कशेरुकाओं को जोड़ने का काम करती है।
’वही से दोनो तरफ दायें-बाये हजारो लाखों की संख्या से तन्त्रिका नर्व निकली होती है। जो मेरुदण्ड के प्रत्येक जोड़ो से निकलती है। और वह निकलकर एक नाड़ी गुच्छक बना लेते है। जिसे डंकपबंस ेबपमदबम की भाषा मे गैग्लियॉन कहा जाता है फिर इन्हीं गैग्लियॉन से पुनः अरबों की संख्या मे तन्त्रिकातन्तु निकलते हैं। जो शरीर के हर कोशिका तक जाकर जुड़ते हैं। यही गैंग्लियांन आपस में मिलकर एक लंबी श्रृंखला बना लेते हैं। जिसे योग की भाषा में दाएं नाड़ी गुच्छक को पिंगला नाडी तथा बाएं नाड़ी गुच्छक को इडा नाडी कहा गया है। जो रक्त संचार, स्वसन क्रिया, पाचन क्रिया तथा प्रतिरक्षा तंत्र के कार्यों को संचालित करती हैं। सूर्यभेदी प्राणायाम इन्हीं नाड़ियों की शुद्धि करता है। इन्हीं नाड़ियों को अध्यात्म की भाषा में उपप्तिकाओ के नाम से संबोधित किया गया है।
अनुकम्पी (सिम्पथेटिक) ऑटोनॉमिक तन्त्रिका तन्त्र पर प्रभाव
सूर्यभेदी प्राणायाम जो दाहिनी नासिका (स्वर) से संबंधित है, जो हमारे अनुकंपी तंत्रिका तंत्र को नियंत्रण एवं संचालन करता है। जब बार-बार दाएं स्वर से क्रिया करते हैं, तब हमारे शरीर की अनुकंपा तंत्रिका तंत्र क्रियाशीतलता और चयापचय दर में वृद्धि होती है। और अनुकंपी तंत्रिका तंत्र से जुड़े सभी अपना काम सुचारू रूप से करते है।
अनुकंपा तंत्रिकाओं द्वारा शरीर के सभी अंगों की क्रियाओं का नियंत्रण एवं नियमन सुचारू रूप से होता है, क्यूटेनियस तंत्रिकाओं के साथ मिलकर यह शरीर की त्वचा की अनैच्छिक मांसपेशियों से क्रिया कराती हैं, तथा शरीर की त्वचा में स्थित रक्त वाहिकाएं इनके उद्दीपन से संकुचित एवं प्रकुचित होती हैं, जिससे हृदय, मस्तिष्क तथा पेशियों को अधिक मात्रा में रक्त मिल पाता है। जिसके परिणाम स्वरूप शरीर का रक्तदाब बढ़ जाता है, और शरीर की पेशियां तन जाती हैं, जिससे मुख लाल हो जाता है, और शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, और नासिका फूल जाती है, आंख की पुतली का बढ़ जाना या कम हो जाना, लार का स्राव होना, हृदय गति का बढ़ जाना, घबराहट, भय, डर, शरीर में अत्यधिक उर्जा उत्पन्न होती है। जिससे सभी प्रकार के वायरस, क्रीमी, दोष तथा मस्तिष्क की शुद्धि होती है। और शरीर से अनावश्यक कफ भी दूर होता है, जिससे मोटापा दूर होता है। और शरीर स्वच्छ निर्मल हो जाता है। ये सभी क्रियाएं इसी अनुकंपी तंत्रिका तंत्र की सक्रियता के परिणाम स्वरूप होती हैं, जो सूर्यभेदी प्राणायाम करने से प्रभावित होती हैं।
थाइमस ग्रंथि पर सूर्यभेदी प्राणायाम का प्रभाव
थाइमस ग्रंथि यह नलिका विहीन ग्रंथि होती है, जिसे लिंफाइड अंग कहा जाता है। क्योंकि थाइमस ग्रंथि के अंदर लिंफोसाइट्स या टी सेल पाई जाती हैं, जो शरीर में प्रतिरक्षा का कार्य करती हैं, यहां वक्ष के सनम हड्डी के पीछे दोनों फेफड़ों के मध्य पाई जाती है यह अंतः स्रावी ग्रंथ जो 18 वर्ष तक विकसित होती है, और धीरे-धीरे उम्र बढ़ने के साथ-साथ इसका क्षय होने लगता है, इसके क्षय होने से प्राणी के जीवन में धीरे-धीरे बुढ़ापा आने लगता है अंततः बुढ़ापे में यह पूरी तरह से समाप्त हो जाती है। मानव शरीर में थाइमस ग्रंथि और सूर्य चक्र की स्थिति समान रूप से हृदय के पीछे फेफड़ों के मध्य बतलाई गई है। तंत्र विज्ञान में षटचक्रों में अनाहत चक्र इसी स्थान पर बतलाया गया है। जिसकी क्रियाशीलता में वृद्धि सिर्फ प्राणायाम के माध्यम से की जा सकती है, क्योंकि थाइमस ग्रंथि प्राणी के शारीरिक विकास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानी गई है।
यह ग्रंथि भ्रूण से लेकर व्यक्ति के 25 वर्ष तक शरीर का निर्माण करने में सहायक होती है। इससे थायमोसिन नामक प्रमुख हार्मोंस का स्राव होता है। इसके अतिरिक्त टी एच एफ टी एफ हार्मोंस निकलते हैं। जो शरीर में उत्पन्न होने वाले विभिन्न प्रकार के वायरस, बैक्टीरिया, क्रीम रोगों (दोषों) को नष्ट करने में सहायक है। साथ ही विषाक्त पदार्थों को नष्ट करने में थाइमस ग्रंथि का महत्वपूर्ण योगदान माना गया है। सूर्यभेदी प्राणायाम जब कुंभक के साथ किया जाता है। तब फेफड़ों में वायु दबाव से थाइमस ग्रंथि क्रियाशील हो जाती है। इसी क्रियाशीलता से थायमोसिन हारमोंस प्रतिरक्षण में मदद करता है, और लिंफोसाइट्स कोजीवाणु या उसके एंटीजन को नष्ट करने के लिए प्रेरित करता है। यह ग्रंथि मानव जीवन के प्रथम चरण 25 वर्ष तक सक्रिय रहती है जैसे -जैसे इस ग्रंथि का क्षरण होता है। वैसे वैसे बुढ़ापा भी मानव जीवन में आने लगता है। सूर्यभेदी प्राणायाम करने पर यह लुप्त या निष्क्रिय ग्रंथि पुनः सक्रिय हो जाती है। क्योंकि थाइमस ग्रंथि वक्ष के नीचे फेफड़ों के मध्य होने के कारण किसी आसन या बंद या मालिश के द्वारा इसकी क्रियाशीलता उत्पन्न नहीं की जा सकती। सिर्फ प्रणायाम से ही आजीवन हम इस ग्रंथ के स्राव का लाभ लेकर वृद्धावस्था तथा मृत्यु को जीत सकते हैं। और हमेशा के लिए प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बना कर स्वास्थ्य प्राप्त कर सकते है। सूर्यभेदी प्राणायाम से जरा मरण का निवारण होता है।
सूर्य चक्र पर प्रभाव
तंत्र विज्ञान, सावित्री साधना एवं योग ग्रंथों में जब षटचक्रों की चर्चा होती है। तब सूर्य चक्र को ही सबसे विशेष एवं महत्वपूर्ण माना गया है। क्योंकि सूर्य चक्र से ही सभी चक्र सक्रिय और प्रभावशीलता होते हैं। सूर्य चक्र की स्थिति मेरुदंड के पीछे दोनों फेफड़ों बीचो बीच मानी गई है। जो सूर्य तत्व तथा उष्णता का प्रतीक है। जब सूर्यभेदी प्राणायाम किया जाता है। तब फेफड़ों में वायु के माध्यम से ऑक्सीजन की मात्रा रक्त कोशिका को अधिक प्राप्त होती है। जिससे सूर्यचक्र अधिक सक्रिय होता है। तब शरीर की सभी कोशिकाओं में स्थित माइट्रोकांड्रिया सेल अधिक उर्जित हो जाती है, और तब वह पुरानी कोशिकाओं की मरम्मत कर नई कोशिकाओं का निर्माण करने में सहायता प्रदान करती है। जिससे मानव शरीर वृद्धावस्था को प्राप्त नहीं होता। इसी प्राणायाम से शरीर में उत्पन्न ऊर्जा से प्राणी में एडीपी एवं एटीपी की प्रक्रिया चलती रहती है। जिसमें सूर्य चक्र से उर्जा लेना फिर उसी ऊर्जा से दैहिक कार्य करने में खर्च करना। यही ऊर्जा नाड़ियों को शुद्ध करक षटचक्रों का भेदन कर मूलाधार में सुप्त कुण्डलिनी को जागृत करती है। और तब तीनों ग्रंथियों का आवेदन होता है। जिससे प्राणी को आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है और वह प्राणी (साधक) ब्रह्मलीन हो जाता है।
मोटापे को दूर करने में सहायक सूर्यभेदी प्राणायाम
सूर्यभेदी प्राणायाम करने से शरीर में अत्याधिक मात्रा में ऊर्जा का संचार होता है। तब शरीर में अधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है और वह ऊर्जा वसीय उत्तक में उपस्थित वसा को धीरे धीरे पिघलाकर शरीर से दूर करती हैं। जिससे मोटापा, हाई बीपी, मधुमेह की समस्या दूर होती है। और शरीर दुबला पतला हो जाता है। जो स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक संतुलित रहता है।
सावधानियां
ऽ सूर्यभेदी प्राणायाम गर्मी को उत्पन्न करने वाला प्राणायाम है इसलिए इससे गर्मी के दिनों में बिल्कुल नहीं करना चाहिए
ऽ चक्कर मोर्चा बेचैनी घबराहट सिर दर्द आदि की समस्या उत्पन्न होने पर सूर्यभेदी प्राणायाम बंद कर देना चाहिए।
ऽ सूर्यभेदी प्राणायाम का अभ्यास हमेशा सर्दियों के दिनों में करना चाहिए
ऽ तीव्र ज्वर उच्च रक्तचाप अत्यधिक व्यास आदि की समस्या में सूर्यभेदी प्राणायाम नहीं करना चाहिए
ऽ हृदय रोग से संबंधित व्यक्तियों को बिना कुंभक के यह अभ्यास करना चाहिए।
निष्कर्ष
अतः इस प्रकार सूर्यभेदी प्राणायाम जो शरीर में उष्णता उत्पन्न करने वाला तथा पिंगला नाड़ी को शुद्ध करें वाला प्राणायाम है। यह प्राणायाम सभी व्यक्ति कर सकते हैं। यह प्राणायाम सभी रोगों को दूर करने तथा विभिन्न प्रकार की आध्यात्मिक शक्तियों को प्रदान करने वाला माना गया है। यह प्राणायाम हमारे अनुकंपा तंत्रिका तंत्र तथा अंतः स्रावी ग्रंथियों में विशेषकर थाइमस ग्रंथि के स्राव तथा नियंत्रण में सहायक है। और सूर्य चक्र को क्रियाशीलता प्रदान कर जरा - मरण से मुक्ति दिलाने में सहायक है। और हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को भी संतुलित करने के साथ-साथ कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर आत्मज्ञान की प्राप्ति कर साधक को ब्रह्म प्राप्ति में सहायक है साथ ही साथ शरीर को कृमि रोगों से दूर करना मस्तिष्क को शुद्ध करना व शरीर के सभी प्रकार के रोगों को दूर करने में अत्यंत प्रभावकारी माना गया है।
संदर्भ
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12. उच्चतर सामान्य मनोविज्ञान अरुण कुमार सिंह, प्रकाशक मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली भारत।
Received on 25.06.2022 Modified on 18.07.2022
Accepted on 10.08.2022 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2022; 10(2):73-80.